शनिवार, 23 अगस्त 2014

निराश किसान जान देने पर अमादा !

दिनेश शाक्य
इटावा । मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के ड्रीम प्रोजेक्ट लखनऊ आगरा एक्सप्रेस वे के निर्माण के लिए किसानो की जमीनो को औने पौने दामो मे लेने के विरोध मे किसान सडको पर उतरने लगा है। खुद मुख्यमंत्री के जिले इटावा मे किसानो के इस विरोध कदम से सरकार की योजना के भलीभूति होने मे शक होने लगा है। सरकार की बेरूखी से खफा किसान प्रशासन की सख्ती से अपने आपको हताश और निराश मान कर अब खुदकुशी करने की चेतावनी देने लगा है।
किसान हितैषी होने का दावा करने वाली उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे ग्रीन फील्ड परियोजना के लिए किसानो की कौडियो के भाव जमीन लिए जाने से खफा मुख्यमंत्री के जिले इटावा के किसानो के व्यापक विरोध के कारण इस परियोजना पर संकट के बादल छाते हुए दिखलाई दे रहे है। इस परियोजना के तहत करीब 3000 किसान अकेले इटावा मे ही प्रभावित हो रहे है। किसानो ने भेदभाव से दुखी हो कर ऐलान कर दिया है कि अगर उनको मुख्यमंत्री के गांव के समकक्ष जमीन की दरे नही मिलती है तो प्रभावित किसान रोजी रोटी की तलाश मे अपनी जान दे दे। प्रभावित होने वाले किसानो ने किसान सभा के आवाहन पर आज किसान प्रतिरोध सभा मे भाग ले कर यह ऐलान किया है।
उत्तर प्रदेश किसान सभा के बैनर तले दोपहर पांच सैकडा से अधिक किसान प्रतिनिधियो ने इटावा मुख्यालय पर जिलाधिकारी डा.नितिन बंसल से मुलाकात करके एक्सप्रेस वे की गई गडबडियो का ज्रिक करते हुए अपनी वेदना बयान की। किसान नेता डी.पी. सिंह का कहना है कि यह प्रतिरोध सभा किसानो की हो रही है अन्यायपूर्ण जमीन अधिग्रहण के विरोध मे हो रही है। हमे भरोसा है कि हमारी मांग हर हाल पूरी होगी किसानो की मांगे जायज है लेकिन सरकार किसी भी सूरत मे मानने को तैयार नही है। उनका कहना है कि किसानो के साथ भेदभाव का यह कौन सा तरीका है कि एक्सप्रेस वे की जमीन को लेने के लिए जो दरे आंकी गई है वो काफी कम है जब कि मुख्यमंत्री के गांव सैफई के किसानो की दरे सामान्य किसानो के मुकाबले आठ गुना अधिक है। बताते चले कि एक्सप्रेस वे के लिए किसानो की जमीन अधिकतम 21 लाख रूपये प्रति हैक्टेयर और न्यूनतम 8 लाख रूपये प्रति हैक्टेयर से ली जा रही है।
बनी हरदू गांव के किसान रणवीर सिंह का कहना है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के गांव मे किसानो को जितना मुआवजा  दिया जा रहा है उससे बहुत कम दर पर हम लोगो को मुआवजा दिया है जिससे हमारे सामने रोजीरोटी का संकट आ खडा होने वाला है। हम अपनी जमीन बचाने के लिए और जमीन का रेट सही कराने के लिए प्रदर्शन कर रहे है हमारे पास 30 बीधा जमीन है लेकिन सरकार की मंशा से बच नही रही है अगर जमीन बची नही तो हमारे सामने मरने के अलावा कोई दूसरा चारा नही है।
अखिलेश सरकार ने किसानो की जमीन को एक्सप्रेस वे के लिए जो दरे लागू की है उसमे व्यापक असमानता देखी जा रही है इसी कारण किसानो की ओर से विरोध शुरू कर दिया गया है। उसे देखने के बाद इस परियोजना पर ग्रहण लगने के संकेत मिलते हुए दिख रहे है। जमीन अधिग्रहण की प्रकिया अपनाये जाने से पहले ही इस योजना का व्यापक विरोध शुरू हो गया  है। किसानो के गुस्से और सरकार की ओर से निर्धारित की गई घनराशि कम मान करके किसान और उनके परिजनो ने जमीन का अधिग्रहण नही करने दे रहे है इसी कारण प्रशासन हताश हो चला है। ऐसे में यह प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ पा रहा है। इटावा के सैकडो किसान इतने गुस्से मे है कि मनमाफिक मुआवजा ना मिलने के दशा मे उन्होने साफ साफ ऐलान कर दिया है कि किसान अपने अपने परिवार के साथ जान देकर इतिश्री कर लेगे।
सैफई तहसील क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण किए जाने पर सवा करोड़ प्रति हेक्टयर की दर से मुआवजा दिया जा रहा है जबकि ताखा तहसील क्षेत्र के किसानों को महज 11 लाख रुपये प्रति हेक्टयर सर्किल रेट निर्धारित किया है,जो अन्याय है। ताखा तहसील के गांव खरगुआ, दींग, रमपुरा, बड़हा, कौआ, भाईपुरा समेत एक दर्जन मौजा की भूमि ली जा रही है। ताखा ही नहीं अपितु सैफई तहसील के गांव लाड़मपुरा, कैशोंपुर बनी, सीपुरा, टिमरूआ, नगला अजीत तथा नगला हीरा के किसानों के साथ भी अन्याय किया जा रहा है। किसान नाथूराम ने कहा कि भूमि अधिग्रहण के बाद हम सभी बेकार हो जायेंगे। सैफई के सर्किल रेट मिलने पर तथा प्रभावित परिवार के एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी, स्थाई पुर्नवास तथा खेतों पर आवागमन तथा सिंचाई के समुचित प्रबंध किए जाएं। मांगे पूरी न होने पर सड़कों पर संघर्ष किया जायेगा।
एक्सप्रेस-वे के लिए भूमि अधिग्रहण में मुआवजे पर किए जा रहे भेदभाव पर किसानों ने सख्त रुख अपना लिया है। किसानों का कहना है कि सैफई के मुकाबले ताखा के किसानों को भूमि अधिग्रहण पर मुआवजा कम दिया जा रहा है। जबकि सैफई की जमीन से ताखा की जमीन अधिक उपजाऊ है। किसानों ने सवाल दागा कि क्या मुुख्यमंत्री का गांव होने की वजह से वहां के किसानों को लाभ दिया जा रहा है। किसानों के साथ यदि इस तरह का भेदभाव हुआ तो वे अपनी जमीन नहीं देंगे।
प्रवेश नियंत्रित एक्सप्रेस वे परियोजना के लिए इटावा जिले के सैफई और ताखा तहसील के किसानों की जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है। ताखा क्षेत्र के किसानों का आरोप है कि सैफई तहसील की जमीन में एक दो फसले ही हो पाती हैं, जबकि ताखा तहसील की जमीन में किसान तीन फसल पैदा करते हैं। इसके बाद भी ताखा की जमीन और सैफई के सर्किल रेट में कई गुने का अंतर है। सैफई का सर्किल रेट प्रथम 1.25 करोड़ , द्वितीय 1.22 करोड़, सामान्य 1.20 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया है, जबकि ताखा क्षेत्र के किसानों के साथ भेदभाव करते हुए सर्किल रेट प्रथम 20 लाख, द्वितीय 15 लाख और सामान्य का 10 लाख रुपये रखा गया है। ताखा क्षेत्र के सैकड़ों किसानों ने डीएम से मिलकर दुखड़ा रोया है। किसानों का कहना है कि कई किसानों के पास एक दो बीघा ही जमीन है। अभी वे इसमें मेहनत मजदूरी कर बच्चों का पेट पाल रहे हैं जमीन जाने के बाद भूखों मरने की स्थितियां पैदा हो जाएंगी।

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

मोदी ने अब्दुल अजीज के खेत से लगाई दहाड



दिनेश शाक्य
वैसे तो नरेंद्र मोदी को कटटर हिंदु वादी माना जाता है इस बात की समय समय पर वो गवाही भी देते रहते है लेकिन मुलायम गढ इटावा के भर्थना मे आज हुई नरेंद्र मोदी की रैली की अगर हम चर्चा करे तो यह रैली पूरी तरह से बडे ही सुनियोजित तरीके से की गई। मोदी ने इस रैली के जरिये मुस्लिम प्रेम भी पूरी तरह से झलका दिया क्यो कि मोदी की रैली जिस खेत मे कराई गई वो अब्दुल अजीज नाम के मुस्लिम का खेत रहा जो भर्थना के ही सरैया गांव का रहने वाला है। जाहिर है मोदी इस रैली के जरिये अपने मुस्लिम प्रेम की राह कुछ दूसरे तरह से दिखाना चाह रहे हो। 
मोदी की रैली को कराने के बाद खुशी से लबरेज भाजपा के कदादवर नेता और पूर्व विधायक अशोक दुबे ने बताया कि जब 55 साल के अब्दुल अजीज को यह बात बताई गयी कि आपके खेत मे मोदी जी की रैली करना चाह रहे है तो वो बेहद खुशी हुआ और उसने अपने खेत को देने मे कोई ऐतराज नही किया बल्कि अपने टूयबबैल से खेत को एकसा करने के लिए पानी भी दिया है। दुबे बताते है कि मोदी की रैली को मुस्लिम की जगह पर कराने की मंशा सिर्फ समसरता  कायम करने की रही है और उसी के तहत यह रैली कराई गई। 
मुलायम और मोदी के बीच जुबानी जंग थमने का नाम नही ले रही है। आज मुलायम गढ मे चुनावी सभा को संबोधित करने आये नरेंद्र मोदी को मुलायम के गांव सैफई की हवाई पटटी पर ही उतर करके आना पडा। यह अलग बात है कि मुलायम के गांव की हवाई पटटी को देखने के लिए अलावा मुलायम के गांव को देखने की हसरत मोदी की पूरी नही हो सकी क्यो कि हवाई पटटी से गांव करीब नौ किलोमीटर की दूरी पर है। 
मोदी ने अपनी सभा मे मुलायम को खूब खरी खोटी सुनाई मोदी ने मुलायम की याददास्त पर सावलिया निशान लगाते हुए कहा कि नेता जी की यह कठिनाई है कि उनको जहा पर कठोर होना चाहिए वहा पर वे मुलायम होते है और जहा पर मुलायम होना चाहिए वहा पर कठोर। 
भाजपा की चाहत भर्थना मे रैली कराने के पीछे मैनपुरी,इटावा और कन्नौज लोकसभा सीटो पर भाजपाईयो मे जोश भरने की मंशा रही है। 
भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की जितनी गूंज देश भर मे सुनाई दे रही है उतना ही विरोध समाजवादी पार्टी और उसके प्रमुख मुलायम सिंह यादव की ओर से किया जा रहा है। जहा एक ओर से उनके सर्मथक उनको सबसे बडा देशप्रेमी बता रहे है वही दूसरी ओर मुलायम सिंह यादव उनको कातिल बता कटघरे मे खडा किया हुआ है। 
मुलायम गढ मे आ रहे सभा संबोधित करने आये नरेंद्र मोदी मुलायम सिंह यादव के गांव सैफई के पास बनी हवाई पटटी पर ही उतरे उसके बाद भर्थना कन्नौज रोड पर होने वाली सभा मे होने वाली सभा के लिए हैलीकाप्टर से रवाना हुए। मुलायम गढ मे नरेंद्र मोदी की यह पहली सभा रही जिसे भर्थना मे कन्नौज रोड पर करीब 20 बीधा खेत मे करवाया गया है। 

शनिवार, 9 मार्च 2013

कम नही है इटावा मे ” मुगल ए आजम ” के निर्माता की कहानी सुनाने वाले






दिनेश शाक्य
हिन्दुस्तान की कालजई फिल्म ” मुगल ए आजम ” के जनक के.आसिफ को दुनिया का अनोखा फिल्मकार माना जाता है। आजादी से पहले इटावा को ए.ओ.हयूम के नाम से जाता था आजादी के बाद राजनैतिक उतार चढाव मे मुलायम सिंह यादव के कारण इटावा की पहचान देश दुनिया बन गई है। अगर बात करे के.आसिफ की तो के.आसिफ के नाम की भी चर्चा आज कम नही हुई है। 14 मार्च 1922 को इटावा मे पैदा हुये आसिफ की मौत 9 मार्च 1971 को भले ही मुंबई मे हो गई है लेकिन आज भी इटावा की गलियो मे उनकी चर्चाये थमी नही है। 
1960 की ” मुगल ए आजम ” देश की आज भी सबसे अधिक कारोबार करने वाली दूसरी फिल्म है। 1327.10 करोड के कारोबार से ” मुगल ए आजम ” को देखने का आनंद आज भी लोग उठाने से नही चूकते है। के.आसिफ का पूरा नाम कमरूददीन आसिफ था लेकिन सिनेमा लाइन मे जाने के बाद उनका नाम कमरूददीन आसिफ से घट करके के.आसिफ हो गया। 
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के इटावा शहर से के.आसिफ का गहरा नाता रहा है। आसिफ की पैदाइश इटावा शहर के कटरा पुर्दल खा नाम के मुहाल मे हुई है। आफिस के इटावा मे जन्म की कहानी भी बडी ही दिलचस्प है आसिफ के मामा असगर आजादी से पहले इटावा मे घोडे वाले पशु डाक्टर के रूप मे तैनात थे मुस्लिम होने के कारण असगर कटरा पुर्दल खा मे एक मकान मे रहते थे। इसी बीच असगर की बहन लाहौर से अपने भाई असगर के पास इटावा आई। भाई असगर के कमरे मे ही बहन ने एक बेटे को जन्म दिया। 14 मार्च 1922 को पैदा हुये लडके का नाम रखा गया कमरूददीन आसिफ जो जवान होने के बाद सिनेमा लाइन मे आने के बाद के.आसिफ के रूप मे लोकप्रिय हो गया है। असगर के पास ही रह करके आसिफ की परवरिश हुई। घर में चारों तरफ ग़रीबी इस तरह पसरी हुई थी कि हर सांस के साथ उसका अहसास भी जिस्म में पहुंच जाता था। सो ऐसे में पढ़ना-लिखना तो क्या होता। सो नहीं हुआ। और नन्हे से आसिफ एक ज़माने तक दर्ज़ी का काम करते रहे। बड़े लोगों के कपड़े सीते-सीते, उसने बड़े-बड़े ख्वाब बुनना भी सीख लिया। जिस मुहाल मे उनकी पैदाइश हुई थी वो आज भले ही इटावा शहर के बीचो बीच मुस्लिम आबादी बाहुल इलाका हो लेकिन 1922 की तस्वीर बिल्कुल जुदा हुआ करती थी उस समय यह मार्ग इटावा बरेली मार्ग के नाम से जाना जाता था।
कटरा पुर्दल खा नामक मुहाल महफूज अली बताते है कि आजादी से पहले आसिफ के मामा इटावा शहर मे घोडे वाले डाक्टर के तौर पर तैनात थे जिनका नाम असगर था। असगर के यहा ही उनकी बहन लाहौर से आई थी बाद मे उन्होने आसिफ को जन्म दिया। असगर जिस मकान मे रहा करते थे वो महफूज अली का ही हुआ करता था। 1935 मे जन्मे महफूज उत्तर प्रदेश रोडवेज विभाग से कैशियर के रूप मे 1995 मे सेवानिवृत्त हो चुके है। उनका कहना है कि उनके बाबा उनको आसिफ और उनके परिवार के के बारे मे अमूमन बताते रहे है। 1960 मे जब ” मुगल ए आजम ” आई उस समय आसिफ और उनके खानदान की चर्चा इटावा की गलियो और कूचो मे लोगो ने करना शुरू कर दिया। महफूज बताते है कि उन्होने खुद अपने साथियो के साथ एक नही करीब 40 से अधिक बार ” मुगल ए आजम ” को देखने का आनंद लिया आज भी जब मन होता है तो ” मुगल ए आजम ” को देख लेता हूँ।
महफूज बताते है कि 1960 के दौर मे जब ” मुगल ए आजम ” आई तो इटावा मे ” मुगल ए आजम ” की चर्चा कम और आसिफ और उनके खानदान की चर्चा अधिक होती थी। जो भी ” मुगल ए आजम ” देखने जाता वो फिल्म खत्म होने के बाद आसिफ की काबलियत के बारे मे जरूर मे अपनी राय सुमारी करने से नही चूकता। 
” मुगल ए आजम ” के दौर मे कोई भी सिनेमा हाल इटावा शहर मे नही थी सिर्फ टूरिंग टाकीज के तौर पर दो मामूली से हाल लालपुरा और नौरंगाबाद मे हुआ करते थे इनमे ही फिल्मे चला करती थी। 
आजादी से पहले इटावा को ए.ओ.हयूम के नाम से जाता था आजादी के बाद राजनैतिक उतार चढाव मे मुलायम सिंह यादव के कारण इटावा की पहचान देश दुनिया बन गई है। अगर बात करे के.आसिफ की तो के.आसिफ के नाम की चर्चा मे आज भी कम नही हुई है। 
कहा जाता है कि आसिफ की प्रारभिंक शिक्षा इटावा के इस्लामिंया इंटर कालेज मे हुई है लेकिन स्कूली का शुरूआती रिकार्ड नही मिलने के कारण अभी सही ढंग से यह तस्दीक नही हो सका है कि उन्होने किस साल मे प्रारभिंक शिक्षा हासिल की है। स्कूल के प्रधानाचार्य डा0मोहम्मद तारिक ने दो दिन तक रिकार्ड खोजबाने की काफी कोशिश की लेकिन कामयाबी नही मिली उनका कहना है कि चूकि स्कूल मे कक्षा 3 से रिकार्ड मौजूद है इससे ऐसा माना जा रहा है कि पहली और दूसरी का रिकार्ड सुरक्षित नही है। 
आजादी से पहले आसिफ के दूसरे और तीसरे नंबर के मामा नजीर और मजीद लाहौर मे फिल्म निर्माण का काम किया करते थे। मुगल ए आजम से पहले 2 और फिल्मो मे काम किया है जिन फिल्मो को कोई वजूद ही नही रहा है। 1947 मे हुये बंटवारे के बाद भारत आ गये है। 1947 के बाद फिल्म सैहपोरजी और पालोन जी नाम के फांइसेंर की मदद से मुगले ए आजम का निर्माण किया है। 
फिल्म 5 अगस्त 1960 को परदे पर आई थी और इसे तैयार करने में कुल एक करोड़ पांच लाख रुपये खर्च हुए थे। बम्बई में मामू थे। निर्माता-निदेशक-अभिनेता एस.नज़ीर. रंजीत फिल्म स्टूडियो के ठीक सामने एक अहाते में फ्लैट लेकर रहते थे। भांजा पहुंचा तो एक बिस्तर और लग गया। मामा के साथ उनके असिस्टेंट बनकर फिल्म बनाने का हुनर भी सीखना शुरू कर दिया। और भी बहुत कुछ सीखा। 
1944 में आसिफ को फिल्म ‘फूल’ के निदेशन का मौका मिला। अपनी पहली ही फिल्म को मल्टी स्टारर बना दिया। पृथ्वीराज कपूर, मज़हर ख़ान, अशरफ ख़ान, दुर्गा खोटे,सुरैया, वीना और याकूब थे। फिल्म की कहानी थी कमाल अमरोही की। इसी फिल्म के निर्माण के दौरान ही आसिफ ने कमाल अमरोही से ‘अनारकली’ की कहानी सुनी।
आसिफ के ख्वाबों से इस कहानी का रंग इस क़दर समाया था कि फौरन ही यह कहानी उसके ख्वाबों का हिस्सा बन गई। मगर इस कहानी का नाम आसिफ के ख़्वाबों से बहुत छोटा था। 
भारतीय फिल्म जगत के इस महान फिल्मकार का पूरा नाम कमरूददीन आसिफ था। उनकी जीवन कहानी वैसी ही रोचक है, जैसी कई सफल व्यक्तियों की हुआ करती है। 
एक मामूली कपड़े सिलने वाले दर्जी के रूप में उन्होंने अपना कॅरियर शुरू किया था। बाद में लगन और मेहनत से निर्माता-निर्देशक बन गए। अपने तीस साल के लम्बे फिल्म कॅरियर में के आसिफ ने सिर्फ तीन मुकम्मल फिल्में बनाई- फूल (1945), हलचल (1951) और मुगल-ए-आजम (1960)। ये तीनों ही बड़ी फिल्में थीं और तीनों में सितारे भी बड़े थे। फूल जहां अपने युग की सबसे बड़ी फिल्म थी, वहीं हलचल ने भी अपने समय में काफी हलचल मचाई थी और मुगल-ए-आजम तो हिंदी फिल्म जगत इतिहास का शिलालेख है।

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

चंबल मे डाकुओ की बजाय बच्चो का याद है अखिलेश का नाम




दिनेश शाक्य 
धांय,धांय,धांय..................................... सिर्फ गोलियो की आवाज ही इन गांवो के आसपास सुनाई देती थी कभी। इसी कारण गांव वालो की जिंदगी नासुर बन गई थी लेकिन अब तस्वीर बिल्कुल बदल चुकी है। ना तो डाकू है और उनकी बंदूक से निकलने वाली गोलियो की धांय धांय करती आवाज। डाकुओ के आंतक और दहशत से आजाद अब गांव वाले अपनी जिंदगी अपने अंदाज मे जीने लगे है। जो सरकारी स्कूल डाकुओ के आंतक से कभी खुला नही करते थे वे आज खुलने लगे है। जिन खेतो मे फसल करने की लोग हिम्मत नही जुटा पाते थे आज इस कदर फसले कर दी है कि पूरे के पूरे चंबल मे सिर्फ हरियाली ही हरियाली नजर आ रही है। सबसे हैरत की बात तो यही मानी जायेगी कि कोई भी गांव वाला अपने बच्चो को अब डाकुओ की नाम भी सुनना पंसद नही करता है इसी कारण स्कूली बच्चो को खूंखार डाकुओ के नामो की जगह अब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का नाम याद है। 
यह तस्वीर किसी एक गांव की नही बल्कि करीब दो दर्जन से अधिक ऐसे गांवो की ही जो कभी खूंखार डाकुओ के आतंक की व्यापक जद मे थे लेकिन आज लगता ही नही कभी इस गांवो मे डाकुओ का साया भी था। इन गांव मे जाने का मौका हमेशा खूंखार जगजीवन परिहार के कारण ही मिला। साल 2003 मे सबसे जगजीवन के चौरैला गांव की तस्वीर को कडे सुरक्षा घेरे मे करीब 10 किलोमीटर लंबी पुलिसिया काबिंग के दौरान देखने को मिला था उससे बाद लगातार आने जाने का सिलसिला चलता रहा। 2006 मे जिस दिन जगजीवन परिहार गैंग की मध्यप्रदेश के मुरैना और भिंड सीमा मे पुलिस से मुठभेड हुई उस दिन भी जगजीवन के खंडहर घर को देख  रहा था। इटावा के अपर जिला जज अमर पाल सिंह ने जगजीवन के दो मौसी के लडके कमलेश और रामेंद्र को उम्रकैद की सजा सुनाई तो गांव का हाल जानने का मन हुआ करीब 8 साल बाद जगजीवन प्रभावित गांवो की तस्वीर पूरी तरह से बदल चुकी है लगता ही नही कि कभी 8 लाख के इनामी सौ डाकुओ के गैंग के आतंक से जूझते रहे होगे।
एक समय चंबल के खूखांर डाकुओ मे सुमार रहे जगजीवन परिहार के गांव चौरैला के आसपास के दर्जनो गांव मे खासी दहशत और आंतक डाकुओ की आवाजाही के कारण देखा और सुना जाता रहा लेकिन जगजीवन के अलावा उसके गैंग के दूसरे सभी डाकुओ को खात्मा हो जाने के बाद अब जगजीवन के गांव और आसपास के गांव मे लोगो मे भय और डर काफूर हो गया है। गांव वाले अब डाकुओ की दहशत से पूरी तरह से आजाद हो गये है। डाकू जगजीवन के गांव चौरैला से सटा हुआ है ललूपूरा गांव जिस गांव को जाने के लिये कभी सिर्फ बीहडी रास्ता हुआ करता था लेकिन आज सरकार ने सडक का निर्माण करके गांव वालो का दिल जीत लिया है। साल 2005 मे होली की रात जगजीवन गैंग के हथियार बंद दर्जनो डकैतो ने आंतक मचाते हुये अपने गांव चौरैला मे अपनी ही जाति के युवक को होलिका मे जिंदा जलाने के बाद ललुपुरा मे चढाई कर दी थी और रधुनाथ को बातचीत के नाम पर गांव मे बने तालाब के पास ला कर मौत के घाट उतार दिया था इतने मे भी डाकुओ को सुकुन नही मिला तो पुरा रामप्रसाद मे जाकर सो रहे दलित को गोली मार कर मौत की नींद मे सुला दिया। 
इस दुर्लभतम कांड की गूंज पूरे देश मे इसलिये सुनाई दी क्यो इससे पहले होलिका मे किसी जिंदा को डाल करके मारने का चंबल के इतिहास का यह पहला मामला था। पहले से बंद सरकारी स्कूलो मे पुलिस और पीएसी बल के जवानो को कैंप करा दिया गया है। आज सरकारी स्कूल डाकुओ के आंतक से पूरी तरह से मुक्ति पा चुका है और लगातार खुल रहा है ना केवल प्राथमिक स्कूल बल्कि जूनियर हाईस्कूल भी। जिनमे गांव के मासूम बच्चे पढने के लिये आते है और पूरे समय रह करके शिक्षको से सीख लेते है। स्कूल मे तैनात हैड मास्टर गोविंद सिंह बताते है कि उनकी इस स्कूल मे तैनाती 14 मई 2009 को हुई थी और तब से लगातार इटावा से वे यहा प्रतिदिन आकर बच्चो को पढाते है। उनका कहना है कि जब उनकी तैनाती का नियुक्त पत्र मिला था तो दो दिन खाना नही खाया था क्यो कि इस इलाके मे होते रहे अपहरणो के बारे मे सुन रखा था लेकिन हिम्मत करके जब इस गांव मे आया तो गांव वालो ने हाथो हाथ लिया। अब ऐसा लगता है कि मानो अपने घर मे ही पढा रहा हूं। 
इसी स्कूल का शिक्षामित्र बृजेश कुमार भी डाकुओ के आतंक का अपना दर्द बयान किये बिना चूका उसने बताया कि जब जगजीवन के इस गांव पर चढाई की थी उसके बाद तो स्कूल पर पीएसी ने कैंप कर लिया तब बच्चो को पढाने के लिये प्रधान के घर पर स्कूल खोला गया था वही पर थोडी बहुत पढाई बच्चो को कराई जाती थी। जगजीवन के साथियो समेत मारे जाने के बाद पूरी तरह से सुकून महसूस हो रहा है। जिस समय डाकुओ का आतंक था उस समय ना तो कोई रिश्तेदार आ पाता था और लोग अपने घरो के बजाय दूसरे मे घरो मे रात बैठ करके काटा करते थे क्यो कि आंतक के कारण आंखो की नींद को भी डाकुओ ने उडा दिया था। शिक्षामित्र बृजेश कुमार यह बताने से भी नही चूका कि पहले कभी खेतो पर रखवाली नही कर पाते थे लेकिन आज अपनी फसलो की भी रखवाली करना बहुत आसान है। डाकुओ के आंतक के कारण पहले ऐसा भी हुआ है कि खेतो मे फसल की धमकी के बाद खेतो मे ही छोड दी अगर कोशिश की तो डाकुओ ने खेतो मे ही आग लगा करके फूक डाली।
स्कूल मे पढने वाले लडको को आज ना तो डाकुओ के बारे मे कोई जानकारी है और ना ही उनके परिजन उनको डाकुओ के बारे मे कुछ भी बताना चाह रहे है। इसी कारण गांव मे मासूम बच्चे पूरी तरह से डाकुओ से अनजान भी है और हमेशा अनजान ही रहना चाह रहे है। कक्षा पांच का छात्र हरिशचंद्र से बात चीत मे एक बात साफ हुई कि उसके माता पिता या फिर गांव वालो ने उसे कभी डाकुओ के बारे मे नही बताया इसी कारण उसे किसी भी डाकु का नाम नही पता है। स्कूल के हैडमास्टर गोविंद सिंह डाकू प्रभावित इस स्कूल के बच्चो को क्या पढा रहे है इसकी एक बानगी यही पर देखने को इसलिये मिल जाती है कि डाकुओ के बजाय स्कूली बच्चे मुख्यमंत्री और जिलाधिकारी का नाम जानने लगे है और डाकुओ को भूल गये है। 
ललूपुरा गांव वासिनी श्रीमती बिटानी देवी का कहना है कि आज बहुत सुकून है जब कल बहुत बुरा था वैसे तो कल को याद ही नही करना चाह रहे है लेकिन जब कभी कल की याद आ जाती है तो मानो ऐसा लगता है कि फिर से गुलाम हो गये। डाकुओ ने आतंक ने पूरी तरह से आजाद को कैद कर लिया था। वे बताती है कि अब तो लोग गांव मे आकर अपने अपने मकानो को बनाने मे भी लग गये जब कि पहले दूर दराज किराये के मकानो को लोग रहा करते थे। 
गांव मे कई ऐसे भी लोग खेत खलिहान और रास्ते पर चलते फिरते मिले जो इससे पहले ना तो कभी नजर आया करते थे या फिर वो अजनबी समान लग रहे थे पता करने पर मालूम हुआ कि डाकूओ के मारे जाने के बाद अपने गांव वापस लौट आये है इनमे चौरैला के हनुमंत सिंह है। हनुमंत सिंह करीब 15 साल पहले गुजरात चले गये थे जहा पर पत्थर की धिसाई का काम करके अपने परिवार का भरण पोषण करते थे लेकिन जगजीवन समेत सभी डाकुओ के मारे जाने के बाद अपने बीबी बच्चो के साथ गांव मे लौट आये है। आज हनुमंत सिंह अपने खेतो मे सरसो,गेंहू की फसल दिखाते हुये बेहद खुश नजर आते। बातचीत के दौरान उनके चेहरे पर आई हंसी गांव मे खत्म हो चुके आंतक की कहानी खुद वा खुद बयान करती है। उनका कहना है कि जब डाकू थे तब ऐसी फसल नही लहलहाती थी लेकिन आज खुद देख सकते है। 
ललुपुरा से निकलने के बाद बीच रास्ते मे चौरैला गांव का राहुल सिंह मिला जो अपने खेतो की ओर जा रहा था उसने बताया कि वो डाकू आंतक के कारण पढने के लिये राजस्थान चला गया था। डाकुओ के मारे जाने के बाद अब अपने गांव लौट आया है और पडौसी राज्य मध्यप्रदेश के एक स्कूल मे कक्षा 12 की पढाई कर रहा है उसकी मंशा एयर फोर्स मे नौकरी करने की। राहुल यह भी बताने से खुश होता है कि जब से उत्तर प्रदेश मे अखिलेश यादव की अगुवाई मे सरकार आई है तब से गांव वालो का 18 घंटे तक बिजली खूब मिल रही है इससे खेतो मे फसल के लिये पानी खूब मिल पा रहा है। 
जगजीवन के गांव चौरैला से करीब 5 किलो मीटर दूर जालौन जिले मे आता है जखेता गांव है। और खूंखार डाकू सलीम गूर्जर का गांव बिडौल जो इसी रास्ते से होता हुआ करीब 8 किलोमीटर दूरी पर है। इन दोनो गांव के लिये जगजीवन परिहार के ही गांव से हो करके रास्ता जाता है। चौरैला के अलावा ललूपुरा,बिडौल,पुरा रामप्रसाद,बिडौरी,पहलन,नीवरी,कचहरी,करियावली,गता,अनेठा,कुवरपुर कुर्छा, खोडन,जाहरपुर,पिपरौली गढिया,गौरनपुरा,बिठौली समेत दर्जनो ऐसे दर्जनो गांव है जिनमे जगजीवन की तूती बोला करती थी। इन गांवो मे डाकूओ के आंतक के कारण गांव मे विकास कार्य कराने की हिम्मत किसी भी सरकारी गैर सरकारी विभाग की नही पडी लेकिन अब डाकुओ के खात्मा हो जाने के बाद नेता कई बार गांव मे सडक नाली बिजली पाने का इंतजाम करना का भरोसा दे गये फिर भी किया कुछ नही इससे गांव वालो मे नाराजगी जरूर है। 
यहा पर हम जिस जगजीवन परिहार के आतंक की चर्चा कर रहे है वो साधारण इंसान ही था लेकिन अपनी जाति के लोगो के संरक्षण के बलबूते पर उसकी ताकत पूरे क्षत्रिय समाज की ताकत मानी जाने लगी थी। चंबल घाटी के कुख्यात दस्यु सरगना के रूप मे आंतक मचाये रहे जगजीवन परिहार का नाम एक बार फिर से सुर्खियो मे आ गया। जगजीवन के सुर्खियो मे आने की मुख्य वजह उमाशंकर दुबे हत्याकांड मे अदालत की ओर से उसके दो मौसी के लडको को उम्र कैद की सजा सुनाया जाना है। जगजीवन ने जाति विशेष के लोगो के सामूहिक अपहरण की वारदातो के अलावा अपने गांव मे होली वाली रात ऐसा वीभत्स कांड किया जिसकी गूंज पूरे देश मे सुनाई दी। जगजीवन ने एक जिंदा आदमी का होलिका मे जलाने के साथ 3 को मौत के घाट उतार करके 5 का अपहरण कर लिया था। साल 2005 हुई इस कांड के बाद जगजीवन के खिलाफ पुलिस ने पूरे मनोयोग से मोर्चा खोल दिया था। उत्तर प्रदेश के इटावा मे अपर जिला जज अमर सिंह की अदालत की उमाशंकर दुबे हत्याकांड मे जगजीवन के मौसी के लडके कमलेश और रामेंद्र को उमकैद की सजा सुनाई गई है। इस कांड मे 12 जून 2007 को इसी हत्याकांड के कल्लू सिंह,केदार सिंह,रामबरन सिंह,सुखदेव सिंह,मुकेश सिंह,समरथ सिंह व मुन्नू सिंह को उम्र कैद की सजा सुनाई जा चुकी है लेकिन कमलेश और रामेंद्र को हुई सजा से एक बार फिर से जगजीवन का नाम सुर्खियो मे आ गया है। 
जगजीवन परिहार ने अपने ही गांव चौरैला गांव के अपने पडोसी उमाशंकर दुबे की 6 मई 2002 को जगजीवन परिहार ने करीब 11 लोगो के साथ मिल करके घारदार हथियारो से काट करके हत्या कर दी थी और सिर और दोनो हाथ काट करके ले गया था। इटावा पुलिस ने जगजीवन को जिंदा या मुर्दा पकडने के लिये इसी कांड के बाद पांच हजार रूपये का इनाम घोषित किया था लेकिन जगजीवन परिहार चंबल घाटी का नामी डकैत बन गया था एक समय जगजीवन परिहार के गैंग पर उत्तर प्रदेश,मध्यप्रदेश और राजस्थान पुलिस ने करीब 8 लाख का इनाम घोषित किया था। उमाशंकर दुबे की हत्याकांड के बाद जगजीवन ने एक जाति विशेष लोगो के एक सौ एक सिर काटने का प्रण किया था इस ऐलान के बाद पूरे चंबल मे सनसनी फैल गई थी। जगजीवन अपना प्रण पूरा कर पाता उससे पहले ही मध्यप्रदेश मे पुलिस ने जोरदार मुठभेड मे जगजीवन समेत गैंग के आठ डकैतो का खात्मा कर दिया।
भले ही जगजीवन परिहार और उसके गैंग का सफाया हो चुका हो लेकिन उमाशंकर दुबे हत्याकांड मे हुई सजा के बाद कोई भी गांव वाला सही ढंग से उस कांड पर चर्चा करना मुनासिब नही समझता है। मध्यप्रदेश की सीमा पर बसे चौरैला गांव मे ना तो उमाशंकर दुबे का परिवार रहता है और ना ही डकैत जगजीवन परिहार के गैंग का कोई सदस्य। उमाशंकर हत्याकांड के बाद बडे स्तर गांव से पलायन शुरू हो गया था। 

शनिवार, 16 जून 2012

ए.ओ.हयूम ने इटावा मे साडी पहन कर बचाई थी जान



दिनेश शाक्य 
काग्रेस सस्थापंक ए.ओ.हयूम को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 17 जून 1857 को उत्तर प्रदेश के इटावा मे जंगे आजादी के सिपाहियो से जान बचाने के लिये साडी पहन कर ग्रामीण महिला का वेष धारण कर भागना पडा था। कहा जाता है कि आजादी के इस दौर मे हयूम को मारने के लिये सेनानियो ने पूरी तरह से घेर लिया था तब हूयम ने साडी पहन कर अपनी पहचान छुपाई थी। ए.ओ.हयूम तब इटावा के कलक्टर हुआ करते थे।
इटावा के हजार साल और इतिहास के झरोखे मे इटावा नाम ऐतिहासिक पुस्तको मे हयूम की बारे मे इन अहम बातो को उल्लेख किया गया है। इटावा के सैनिको ने हयूम और उनके परिवार को मार डालने की योजना बनाई जिसकी भनक लगते ही 17 जून 1857 को हयूम को महिला के वेश मे गुप्त ढंग से इटावा से निकल कर बढपुरा पहुच गये और सात दिनो तक बढपुरा मे छिपे रहे।
एलन ऑक्टेवियन हयूम यानि ए.ओ.हयूम ! एक ऐसा नाम है जिसके बारे मे कहा जाता है कि उसने गुलामी के दौर मे अपने अंदाज मे ना केवल जिंदगी को जिया बल्कि अपनी सूझबूझ से देश को काग्रेस के रूप मे एक ऐसा नाम दिया जो आज देश की तस्वीर और तदवीर बन गया है। 
एलन ऑक्टेवियन हयूम यानि ए.ओ.हयूम को वैसे तो आम तौर सिर्फ काग्रेस के सस्थापक के तौर पर जाना और पहचाना जाता है लेकिन ए.ओ.हयूम की कई पहचाने रही है जिनके बारे मे ना तो देश का हर नागरिक जानता है और ना ही देश की सबसे बडी पार्टी काग्रेस के नेता और कार्यकर्ता जानते है। इस नाम मे बहुत कुछ छिपा हुआ है जिसे सही से जानने के लिये के देश की गुलामी के दौर मे जाने की जरूरत पडेगी।
बात शुरू करते है यमुना और चंबल नदी के किनारे बसे उत्तर प्रदेश के छोटे से जिले इटावा की। 4 फरवरी 1856 को इटावा के कलक्टर के रूप मे ए.ओ.हयूम की तैनाती अग्रेज सरकार की ओर से की गई। हयूम की एक अग्रेज अफसर के तौर पर कलक्टर के रूप मे पहली तैनाती है।
ए.ओ.हयूम  इटावा मे अपने कार्यकाल के दौरान 1867 तक तैनात रहे। आते ही हयूम ने अपनी कार्यक्षमता का परिचय देना शुरू कर दिया। 16 जून 1856 को हयूम ने इटावा के लोगो की जनस्वास्थ्य सुविधाओ को मददेनजर रखते हुये मुख्यालय पर एक सरकारी अस्पताल का निर्माण कराया तथा स्थानीय लोगो की मदद से हयूम ने खुद के अंश से 32 स्कूलो को निर्माण कराया जिसमे 5683 बालक बालिका अध्ययनरत रहे। खास बात यह है कि उस वक्त बालिका शिक्षा का जोर ना के बराबर रहा होगा तभी तो सिर्फ 2 ही बालिका अध्ययन के लिये सामने आई। 
हयूम ने इटावा को एक बडा व्यापारिक केंद्र बनाने का निर्णय लेते हुये अपने ही नाम के उपनाम हयूम से हयूमगंज की स्थापना करके हाट बाजार खुलवाया जो आज बदलते समय मे होमगंज के रूप मे बडा व्यापारिक केंद्र बन गया है। 
1857 के गदर के बाद इटावा मे हयूम ने एक शासक के तौर पर जो कठिनाईया आमलोगो को देखी उसको जोडते हुये 27 मार्च 1861 को भारतीयो के पक्ष मे जो रिपोर्ट  अग्रेज सरकार को भेजी उससे हूयूम के लिये अग्रेज सरकार ने नाक भौह तान ली और हयूम को तत्काल बीमारी की छुटटी नाम पर ब्रिटेन भेज दिया। एक नंबवर 1861 को हूयूम ने अपनी रिर्पोट को लेकर अग्रेज सरकार ने माफी मागी तो 14 फरवरी 1963 को पुनः इटावा के कलक्टर के रूप मे तैनात कर दी गई। 
हूयूम को अग्रेज अफसर के रूप मे माना जाता है जिसने अपने समय से पहले बहुत आगे के बारे मे ना केवल सोचा बल्कि उस पर काम भी किया। वैसे तो इटावा का वजूद हयूम के यहा आने से पहले ही हो गया था लेकिन हूयूम ने जो कुछ दिया उसके कोई दूसरी मिसाल देखने को कही भी नही मिलती एक अग्रेज अफसर होने के बावजूद भी हूयूम का यही इटावा प्रेम हूयूम के लिये मुसीबत का कारण बना।
हयूम की इतनी लंबी चौडी दास्तान इटावा से जुडी हुई जिसे कितना भी कम करके आंका जाये तो कम नही होगा। हयूम की इस दास्तान को सुनाने के पीछे भी एक वजह यह है कि हयूम ने इटावा मे अपने कार्यकाल के दौरान आज की भारतीय राष्ट्रीय काग्रेस की स्थापना का खाका खींचा और इटावा से जाने के बाद स्थापना भी की ।
साल 1858 के मघ्य मे हयूम ने राजभक्त जमीदारों की अध्यक्षता में ठाकुरों की एक स्थानीय रक्षक सेना का गठन किया,जिसका उददेश्य इटावा में शांति स्थापित करना था। अपने उददेश्य के मुताबिक इस सेना को यहां पर शांति स्थापित करने में काफी हद तक सफलता मिली थी। रक्षक सेना की सफलता को देखते हुये 28 दिसंबर 1885 को मुबंई में ब्रिटिश प्रशासक ए.ओ.हयूम ने काग्रेंस की नीवं डाली जो आज देश की एक प्रमुख राजनैतिक पार्टी हैं। इटावा में स्थानीय रक्षक सेना के गठन की भी बडी दिलचस्प कहानी है। 1856 में ए.ओ.हयूम इटावा के कलक्टर बन कर आये। कुछ समय तक यहां पर शांति रही। डलहौजी की व्ययगत संधि के कारण देशी राज्यों में अपने अधिकार हनन को लेकर ईस्ट इंडिया कंपनी के विरद्ध आक्रोश व्याप्त हो चुका था। चर्बी लगे कारतूसों क कारण 6 मई 1857 में मेरठ से सैनिक विद्रोह भडक था। उत्तर प्रदेश तथा दिल्ली से लगे हुये अन्य क्षेत्र ईस्ट इंडिया कंपनी ने अत्यधिक संवेदनशील घोषित कर दिये थे। ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भारतीयों की संख्या भी बडी मात्रा में थी। हयूम ने इटावा की सुरक्षा व्यवस्था को घ्यान में रख कर शहर की सडकों पर गश्त तेज कर दी थी। 16 मई 1857 की आधी रात को सात हथियारबंद सिपाही इटावा के सडक पर शहर कोतवाल ने पकडे। ये मेरठ के पठान विद्रोही थे और अपने गांव फतेहपुर लौट रहे थे। कलक्टर हयूम को सूचना दी गई और उन्हें कमांडिंग  अफसर कार्नफील्ड पर गोली चला दी लेकिन वी बच गया। विद्रोहियों ने कार्नफील्ड पर गोली चला दी लेकिन वह बच गया.इस पर क्रोधित होकर उसने चार को गोली से उडा दिया परन्तु तीन विद्रोही भाग निकले। 
इटावा में 1857 के विद्रोह की स्थिति भिन्न थी। इटावा के राजपूत विद्रोहियों का खुलकर साथ नहीं दे पा रहे थे,19 मई 1857 को इटावा आगरा रोड पर जसवंतनगर के बलैया मंदिर के निकट बाहर से आ रहे कुछ सशस्त्र विद्रोहियों और गश्ती पुलिस के मध्य मुठभेड हुई। विद्राहियों ने मंदिर के अंदर धुस कर मोर्चा लगाया.कलक्टर हयूम और ज्वाइंट मजिस्ट्रेट डेनियल ने मंदिर का घेरा डाल दिया। गोलीबारी में डेनियल मारा गया और हयूम वापस इटावा लौट आये जब कि पुलिस घेरा डाले रही लेकिन रात को आई भीषण आंधी का लाभ उठा कर विद्रोही भाग गये।
इस बीच मैनपुरी और अलीगढ में नौ नबंबर की देशी पल्टन ने विद्रोह कर दिया। इटावा के लिये खतरा और भी बढ गया था। ए.ओ.हयूम की देशी पलटन को बढपुरा की ओर रवाना करने के निर्देश दिया गया इस पलटन के साथ इटावा में रह रहे अग्रेंज परिवार भी थे,इटावा के यमुना तट पर पहुंचते ही सिपाहियों को छोडकर बाकी सभी इटावा वापस लौट आये.इसी बीच हयूम ने एक दूरदर्शी कार्य किया कि उन्होंने इटावा में स्थित खजाने का एक बडा हिस्सा आगरा भेज दिया था तथा शेष इटावा के ही अग्रेंजो के वफादार अयोध्या प्रसाद की कोठी में छुपा दिया था। इटावा के विद्रोहियों ने पूरे शहर पर अपना अधिकार कर लिया और खजाने में शेष बचा चार लाख रूपया लूट लिया.इसके बाद अगेंजों को विद्रोहियों ने इटावा छोडने का फरमान दे दिया।
देश के प्रमुख राजनैतिक दल काग्रेंस की स्थापना उत्तर प्रदेश के इटावा में 1858 के मध्य में क्रांतिकारियों से निपटने के लिये गठित की गई रक्षक सेना की सफलता से प्ररित हो कर की गई थी। आजादी पूर्व इटावा के कलक्टर रहे काग्रेंस संस्थापक ए.ओ.हयूम ने इटावा में क्रांतिकारियों से निपटने में कामयाबी पाई। 
इटावा में अपने कलक्टर कार्यकाल के दौरान हयूम ने अपने नाम के अग्रेंजी शब्द के एच.यू.एम.ई.के रूप में चार इमारतों का निर्माण कराया जो आज भी हयूम की दूरदर्शिता की याद दिलाते है। स्कॉटलैंड से चुने जाने वाले एक ब्रिटिश सांसद की संतान एलन ऑक्टेवियन ह्यूम 1857 के गदर के दौरान इटावा के कलेक्टर थे और वहां उनकी क्रूरता की कुछ कहानियां भी प्रचलित हैं। लेकिन बाद में उनकी पहचान एक अडियल घुमंतू पक्षी विज्ञानी और शौकिया कृषि विशेषज्ञ की बनी। 
पर्यावरणीय संस्था का संचालन करने वाले डा.राजीव चौहान बताते है किए.ओ.हयूम को पक्षियो से खासा प्रेम काफी रहा है। इटावा मे अपनी तैनाती के दौरान अपने आवास पर हयूम ने 165 से अधिक चिडियो का संकलन करके रखा था एक आवास की छत ढहने से सभी की मौत हो गई थी। इसके अलावा कलक्टर आवास मे ही बरगद का पेड पर 35 प्रजाति की चिडिया हमेशा बनी रहती थी। साइवेरियन क्रेन को भी हयूम ने सबसे पहले इटावा के उत्तर सीमा पर बसे सोंज बैंडलैंड मे देखे गये सारस क्रेन से भी लोगो को रूबर कराया था। 

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

सोनिया का आदर हयूम का अनादर


दिनेश शाक्य 
ए.ओ.हयूम और सोनिया गांधी, दोनों ऐसे विदेशी नाम हैं, जिनका कांग्रेस के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान है। ए.ओ.हयूम जंहा काग्रेस के संस्थापक है और सोनिया गांधी काग्रेस की अध्यक्ष है। लेकिन, जहां एक ओर विदेशी मूल की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांघी को कांग्रेसी स्वीकार कर चुके हैं, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के संस्थापक ए. ओ. हयूम से कांग्रेसियों को गुरेज है। 
दो-तीन पार्टियों को छोड़कर दुनिया में शायद ही किसी राजनीतिक पार्टी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जितनी लंबी जिंदगी नसीब हुई हो। देश की परिस्थितियां इतनी बदल चुकी है कि 28 दिसंबर 1885 और 28 दिसंबर 2011 के बीच एक भी साझा बात खोजना असंभव लगता है लेकिन कांग्रेस में कुछ साझा बातें सहज ही देखी जा सकती हैं। करीब 126 साल पहले इस पार्टी के केंद्र में थियोसॉफिकल सोसाइटी से जुड़े एक अनोखे यूरोपीय व्यक्तित्व ए.ओ.हयूम थे,जबकि आज इसके केंद्र में यूरोपीय मूल की एक अन्य व्यक्तित्व सोनिया गांधी हैं।
एलन ऑक्टेवियन हयूम यानि ए.ओ.हयूम ! एक ऐसा नाम है जिसके बारे मे कहा जाता है कि उसने गुलामी के दौर मे अपने अंदाज मे ना केवल जिंदगी को जिया बल्कि अपनी सूझबूझ से देश को काग्रेस के रूप मे एक ऐसा नाम दिया जो आज देश की तस्वीर और तदवीर बन गया है। 
4 फरवरी 1856 को इटावा के कलक्टर के रूप मे ए.ओ.हयूम की तैनाती अग्रेज सरकार की ओर से की गई। हयूम की एक अग्रेज अफसर के तौर पर कलक्टर के रूप मे पहली तैनाती है।
ए.ओ.हयूम  इटावा मे अपने कार्यकाल के दौरान 1867 तक तैनात रहे। आते ही हयूम ने अपनी कार्यक्षमता का परिचय देना शुरू कर दिया। 16 जून 1856 को हयूम ने इटावा के लोगो की जनस्वास्थ्य सुविधाओ को मददेनजर रखते हुये मुख्यालय पर एक सरकारी अस्पताल का निर्माण कराया तथा स्थानीय लोगो की मदद से हयूम ने खुद के अंश से 32 स्कूलो को निर्माण कराया जिसमे 5683 बालक बालिका अध्ययनरत रहे खास बात यह है कि उस वक्त बालिका शिक्षा का जोर ना के बराबर रहा होगा तभी तो सिर्फ 2 ही बालिका अध्ययन के लिये सामने आई। 
हयूम ने इटावा को एक बडा व्यापारिक केंद्र बनाने का निर्णय लेते हुये अपने ही नाम के उपनाम हयूम से हयूमगंज की स्थापना करके हाट बाजार खुलवाया जो आज बदलते समय मे होमगंज के रूप मे बडा व्यापारिक केंद्र बन गया है।
हयूम ने अपने कार्यकाल के दौरान इटावा शहर मे मैट्रिक शिक्षा के उत्थान की दिशा मे काम करना शुरू किया। जिस स्कूल का निर्माण हयूम ने 17500 की रकम के जरिये कराया वो 22 जनवरी 1861 को बन कर के तैयार हुआ और हूयम ने इसको नाम दिया हयूम एजोकेशन स्कूल। इस स्कूल के निर्माण की सबसे खास बात यह रही कि हयूम के प्रथमाअक्षर एच शब्द के आकार का रूप दिया गया। आज इस स्कूल का संचालन इटावा की हिंदू एजूकेशलन सोसाइटी सनातन धर्म इंटर कालेज के रूप मे कर रही है। 
हयूम ने इटावा मे गुलामी के दौर मे अग्रेजो के लिये एक प्रार्थना स्थल चर्च का निर्माण कराया उसके पास ही इटावा क्लब की स्थापना इसलिये कराई ताकि बाहर से आने वाले मेहमानो को रूकवाया जा सके क्यो कि इससे पहले कोई दूसरा ऐसा स्थान नही था जहा पर मेहमानो को रूकवाया जा सके। सिंतबर 1944 को हुई जोरदार वारिस मे यह भवन धरासाई हो गया जिसे नंबवर 1946 मे पैतीस हजार रूपये खर्च करके पुननिर्मित कराया गया था। 
1857 के गदर के बाद इटावा मे हयूम ने एक शासक के तौर पर जो कठिनाईया आम लोगो को देखी उसको जोडते हुये 27 मार्च 1861 को भारतीयो के पक्ष मे जो रिपोर्ट  अग्रेज सरकार को भेजी उससे हूयूम के लिये अग्रेज सरकार ने नाक भौह तान ली और हयूम को तत्काल बीमारी की छुटटी नाम पर ब्रिटेन भेज दिया। एक नंबवर 1861 को हूयूम ने अपनी रिर्पोट को लेकर अग्रेज सरकार ने माफी मागी तो 14 फरवरी 1963 को पुनः इटावा के कलक्टर के रूप मे तैनात कर दी गई। 
हूयूम को अग्रेज अफसर के रूप मे माना जाता है जिसने अपने समय से पहले बहुत आगे के बारे मे ना केवल सोचा बल्कि उस पर काम भी किया। वैसे तो इटावा का वजूद हयूम के यहा आने से पहले ही हो गया था लेकिन हूयूम ने जो कुछ दिया उसके कोई दूसरी मिसाल देखने को कही भी नही मिलती एक अग्रेज अफसर होने के बावजूद भी हूयूम का यही इटावाप्रेम हूयूम के लिये मुसीबत का कारण बना।
हयूम ने गुलामी के दौर मे इटावा को जो कुछ दिया उसकी अस्क आज भी बाकायदा देखने को मिलता है हूयम को कू्रर शासक माना जाता है इसमे कोई दो राय नही है लेकिन हूयूम ने इटावा मे यह जरूर पा लिया था अगर इन लोगो पर शासन करना तो क्रूरता के बजाये नम्रता का भाव प्रदर्शित करना पडेगा और हयूम ने किया भी वही लेकिन हयूम की यही नम्रता हयूम के लिये मुसीबत बन गई। 
साल 1858 के मघ्य मे हयूम ने  राजभक्त जमीदारों की अध्यक्षता में ठाकुरों की एक स्थानीय रक्षक सेना का गठन किया,जिसका उददेश्य इटावा में शांति स्थापित करना था। अपने उददेश्य के मुताबिक इस सेना को यहां पर शांति स्थापित करने में काफी हद तक सफलता मिली थी। रक्षक सेना की सफलता को देखते हुये 28 दिसंबर 1885 को मुबंई में ब्रिटिश प्रशासक ए.ओ.हयूम ने काग्रेंस की नीवं डाली जो आज देश की एक प्रमुख राजनैतिक पार्टी हैं। इटावा में स्थानीय रक्षक सेना के गठन की भी बडी दिलचस्प कहानी है। 1856 में ए.ओ.हयूम इटावा के कलक्टर बन कर आये। 
देश के प्रमुख राजनैतिक दल काग्रेंस की स्थापना उत्तर प्रदेश के इटावा में 1858 के मध्य में क्रांतिकारियों से निपटने के लिये गठित की गई रक्षक सेना की सफलता से प्ररित हो कर की गई थी। आजादी पूर्व इटावा के कलक्टर रहे काग्रेंस संस्थापक ए.ओ.हयूम ने इटावा में क्रांतिकारियों से निपटने में कामयाबी पाई। रक्षक सेना से प्रेरण लेकर 28 दिसंबर 1885 को बंबई में काग्रेंस की स्थापना अंग्रेज सरकार के लिये सेफ्टीवाल्व के रूप में की थी। फिर भी कांग्रेस के स्थानीय नेता विदेशी मूल की होने के बावजूद सोनिया गांधी को तो अपना सर्वोच्च नेता मानते हैं लेकिन ए ओ हयूम से कोई नाता नहीं जोड़ना चाहते। 
ए.ओ.हयूम ने वर्ष 1885 में मुंबई में अखिल भारतीय काग्रेंस की नींव डाली परन्तु इटावा में इसका प्रभाव बहुत पहले ही देखने को मिलने लगा था। एक छोटे से पंडाल में एकत्रित होकर कभी कभी प्रस्ताव पास कर लेना इसका उददेश्य था।
इटावा में अपने कलक्टर कार्यकाल के दौरान हयूम ने अपने नाम के अग्रेंजी शब्द के एच.यू.एम.ई.के रूप में चार इमारतों का निर्माण कराया जो आज भी हयूम की दूरदर्शिता की याद दिलाते है लेकिन इटावा के काग्रेंसी किसी भी तरह का हयूम का महिमामंडन करने से परहेज करते हुये नजर आते है।  भले ही इटावा के कांग्रेसी इस बात पर गर्व महसूस करते हो की हयूम को इटावा में कार्यकाल के दौरान इस तरह का इल्म हुआ की भारतीयो को एक तार में जोडने के इरादे से एक दल की जरूरत है लेकिन जब बात आती है कि उन्हे याद करने के सवाल पर तो इटावा के काग्रेसी एक दूसरे की ओर देखने लगते है। अब बदलते हुए दौर में इटावा के काग्रेंसियों का कोई गुरेज नहीं होगा कि ए.ओ.हयूम की कोई प्रतिमा या स्टेचू स्थापित किया जाये।
स्कॉटलैंड से चुने जाने वाले एक ब्रिटिश सांसद की संतान एलन ऑक्टेवियन ह्यूम 1857 के गदर के दौरान इटावा के कलेक्टर थे और वहां उनकी क्रूरता की कुछ कहानियां भी प्रचलित हैं। लेकिन बाद में उनकी पहचान एक अडियल घुमंतू पक्षी विज्ञानी और शौकिया कृषि विशेषज्ञ की बनी। 
ए.ओ.ह्यूम भारत देश के अपमान से जुडा हुआ शब्द है इस लिये देश के काग्रेंसी उनसे नफरत करते है,आजादी के दौरान देश के स्वतंत्रता सेनानियों के नरसंहार के लिये हयूम को दोषी मानते हुये काग्रेंसी उनसे परहेज करते दिख रहे है। 1857 के गदर के दौरान हयूम अग्रेज शासक के साथ कू्रर तानाशाह के रूप मे सामने आ चुके है उनके कारनामे इतिहास के पन्नो मे दर्ज है इसलिये हयूम के कारानामो का ज्रिक करना उचित नही रहेगा।
हिंदु एजूकेशन सोसायटी इस बाबत बेहद खुश है क्यो कि वो काग्रेस सस्ंथापक निर्मित स्कूल की रखवाली करके अपने आप को अभीभूत महसूस करते है।  इस सोसायटी के मौजूदा सचिव अतुल शर्मा का कहना है कि हयूम साहब ने स्कूल का निर्माण तो कराया लेकिन संचालन के लिये इस स्कूल को हिंदु एजूकेशन सोसायटी को ही बेच दिया करीब 40 हजार रूपये मे हयूम साहब ने इस स्कूल को बेचा और आज यह स्कूल सनातन धर्म इंटर कालेज के नाम से संचालित हो रहा है। 
एलन ऑक्टेवियन हयूम यानि ए.ओ.हयूम को पक्षियो से खासा प्रेम काफी रहा है। इटावा मे अपनी तैनाती के दौरान अपने आवास पर हयूम ने 165 से अधिक चिडियो का संकलन करके रखा था एक आवास की छत ढहने से सभी की मौत हो गई थी। इसके अलावा कलक्टर आवास मे ही बरगद का पेड पर 35 प्रजाति की चिडिया हमेशा बनी रहती थी। साइवेरियन क्रेन को भी हयूम ने सबसे पहले इटावा के उत्तर सीमा पर बसे सोंज बैंडलैंड मे देखे गये सारस क्रेन से भी लोगो को रूबर कराया था। 
+ डा.राजीव चौहान,सचिव,सोसायटी फार कंजरवेशन आफ नेचर
15 अगस्त,1947 को जब देश आजाद हुआ था तब देश में विदेशी आक्रांताओ के खिलाफ जोरदारी के साथ माहौल बना हुआ था ऐसे में हयूम की कोई भी तस्वीर या फिर प्रतिमा की स्थापना देश हित में नहीं हो सकती थी इस लिये अपने संस्थापक की कोई भी प्रतिमा इटावा तो क्या देश किसी भी दूसरे हिस्से में स्थापित नहीं है लेकिन जब उनसे सोनिया के विदेशी होने के सिलसिले से जुडा हुआ सवाल किया गया तो वे सही ढंग से जबाब दे पाने की हालत में नही  दिखे अलबत्ता वे इतना जरूर कहते है कि अगर अब हयूम की कोई तस्वीर या फिर प्रमिता की स्थापना की जाती है तो उन्हें क्या शायद किसी भी काग्रेंसी को कोई गुरेज नहीं होगा। इसके अलावा वो यह कहने से कतई नही चूकते है कि हयूम का इटावा के उत्थान मे किये गये योगदान को किसी भी सूरत मे भुलाया नही जा सकता है एक विदेशी होने के बावजूद हयूम के मन कही ना कही भारत प्रेम था। 
+ सूरज सिंह यादव,वरिष्ठ काग्रेस नेता
ए.ओ.हयूम और इटावा का गहरा नाता रहा है और हमेशा रहेगा। हयूम के बारे मे हर कोई जानता है कि उन्होने इटावा मे ही काग्रेस की स्थापना का खाका खींच लिया था। आज भले ही इटावा को मुलायम सिंह यादव के जिले के रूप मे पहचाना जाता हो लेकिन हकीकत मे इटावा मुलायम का नही बल्कि हयूम का शहर है क्यो कि हयूम ही वो शख्स थे जो इटावा को वजूद मे लाये हयूम से पहले इटावा सिर्फ कागजो मे ही इटावा था धरातल पर इटावा बनाने का काम हयूम ने किया। कहा जाता है कि 1857 के गदर के बाद हयूम के मन मे यह बात घर कर गई कि प्रखर राष्ट्रवाद की जो आग सारे देश मे फैल गई है उसको बिना भारतीयो का साथ लेकर किसी भी सूरत मे कामयाबी नही पाई जा सकती है। तभी हयूम ने 1858 मे दुबारा अपनी तैनाती के दौरान स्थानीय रक्षक सेना का गठन किया जिसके जरिये हयूम ने इटावा मे पनपे जनअसंतोष को शांत करने मे ना केवल कामयाबी पाई बल्कि अपने मिशन मे कामयाब भी हुआ और 1867 मे इटावा से हटने के बाद 1885 मे भारतीय राष्ट्रीय यूनियन का गठन किया जो बाद मे इंडियन नेशनल काग्रेस के रूप मे तब्दील हो गई। 
+ वाचस्पति द्विवेदी,प्रवक्ता,काग्रेस ईकाई,इटावा 

मौत की पटरियो से गुजरती रेलगाडिया


दिनेश शाक्य 
देश के सबसे अधिक महत्वपूर्ण दिल्ली हावडा रेलमार्ग पर इन दिनो रेल यात्रियो की जान मुश्किल मे फंसी हुई नजर आ रही है रेल यात्रियो की जान मुश्किल मे फंसने की वजह मानी जा रही इस रेलवे मार्ग पर आये दिन रेल पटरियो का टूटना। लगातार टूट रही रेल पटरियो को लेकर अब रेल यात्रियो को रेल हादसो का खतरा सताने लगा है।
इटावा मे रेल पटरियो के टूटने के वाक्ये थमने का नाम नही ले रहे है। इटावा मे बलरई से लेकर साम्हो तक रेलमार्ग सबसे अधिक खतरे वाला माना जा रहा है क्यो कि सर्दी का मौसम अभी सही से शुरू भी नही हुआ और रेल पटरिया टूटना शुरू हो गयी है साल 2010 मे डाउन लाइन की करीब 60 से अधिक बार रेल पटरिया कई स्थानो पर टूटी थी। उसके बाद रेल विभाग ने प्रभावित समझे जाने वाली रेल पटरिया को बदल दिया था लेकिन इस बार आया है अप लाइन की रेल पटरियो पर कहर । 
रेलवे की तरफ से बताया जा रहा है कि इन पटरियो की मियाद 12 साल के करीब और 800 मिलियन जीएमटी तक का भार ढोने की होती है लेकिन यह पटरिया तो उससे भी अधिक भार ढो चुकी है।
इटावा के कर्मक्षेत्र पोस्ट ग्रेजुएट कालेज के फिजिक्स के रीडर डा0सतेंद्र कुमार सिंह का मानना है कि रेलवे ठेके प्रथा के तहत काम कर रहा है हो सकता है कि जो रेल पटरियो को पहले बिछाया गया रहा होगा उसकी क्वालिटी मानक के अनुरूप सही ना रही हो।
फतेहपुर मे कालका मेल हादसे के बाद कई यात्री रेल गाडियो के अलावा मालगाडिया दुर्घटनाग्रस्त हुई। इन हादसो के पीछे सबसे अहम बिंदु रेल पटरियो का या तो कमजोर होना या फिर क्षतिग्रस्त होना माना गया। खराब रेल पटरियो को लेकर रेलवे विभाग को काफी समय से चेताया जाता रहा है उसके बाद रेल विभाग ने खराब रेल पटरियो को दुरूस्त कराने के लिये रेल ग्रेडिंग मशीन को अमरीका से मंगवाया एक ऐसी ही मशीन देश से सबसे अहम माने जाने वाले रेलमार्ग पर दिल्ली हावडा पर कमजोर और क्षतिग्रस्त रेलपटरियो को दुरूस्त करवा दिया गया लेकिन अभी भी रेल पटरियो को टूटने से रोका नही जा सका है। 
वैसे तो रेल पटरियो को बहुत मजबूत माना जाता है लेकिन जब कोई रेल गाडी हादसे का शिकार होती है तो रेल पटरी ताश के पत्तो की भांति बिखर जाती है।
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर मे हुये कालका मेल हादसे के बाद भी रेल अमले की जांच मे यह बात सामने आई की रेल हादसा का कारण रेल पटरी का पहले से टूटा होना पाया गया उसके बाद इसी रेलवे रूट पर कई रेल हादसे पेश आये। 27 जुलाई को इटावा मे सराय भूपत के पास पैसेंजर रेल गाडी के पलटने को लेकर रेल पटरी ही क्षतिग्रस्त होना माना गया। पहले से ही रेल पटरियो के टूटने को लेकर मंथन मे जुटे रेल अमले ने आनन फानन मे अमरीकन रेल ग्रेडिंग मशीन को मंगवा कर कमजोर पटरियो को खोजने का काम शुरू कर दिया है।
रेलवे अफसरो के अनुसार फिलहाल अभी देश मे सिर्फ दो ही ऐसी मशीन आई है जो कमजोर रेल पटरियो को खोजने का काम कर रही है। जिनमे एक देश की सबसे अहम रेलवे रूट दिल्ली हावडा पर कमजोर पटरियो को खोज रही है। इस मशीन की खासियत यह है यह मशीन पूरी की पूरी कम्प्यूटरीकृत है जिसमे सब कुछ आन स्क्रीन ही होता है। इटावा और इटावा के आसपास रेल पटरियो को दुरूस्त करने का काम करने मे लगी हुई यह मशीन दिल्ली हावडा रेल मार्ग पर अब तक करीब 700 किलोमीटर की दूरी तय कर चुकी है। इस मशीन मे आगे और पीछे कई कैमरे लगे हुये है। यह मशीन लुधियाना से हावडा तक की रेलवे पटरियो को जांचने का काम कर चुकी है। 
बताते चले कि इटावा मे करीब 60 किलोमीटर के दायरे मे सर्दी के मौसम से लेकर अब तक करीब 100 से अधिक जगह पर रेल पटरियो को टूटने के मामले सामने आ चुके है जिसके बाद से लगातार रेल पटरियो को बदलने की मांग कई बार होती रही है।