मंगलवार, 16 अगस्त 2011

अन्ना का साथ देने को उतरी चंबल की सुदंरी सीमा परिहार


दिनेश शाक्य
भ्रष्ट्राचार के खिलाफ जोरदार मुहिम के चलते लोकप्रिय समाजसेवी अन्ना हजारे की गिरफ्तारी  के बाद पूरे देश भर मे उबाल आ गया है। मुलायम सिंह यादव का इटावा जिला बैसे तो समाजवादी पार्टी के प्रभाव वाला इलाका माना जाता है लेकिन जब कभी देश से जुडी गंभीर विषयो पर मोर्चो  की बात रही तो यहा के लोग कभी भी पीछे नही रहे है। अन्ना हजारे की गिरफतारी के तुरंत बाद खासी तादात मे इटावा के लोगो ने प्रर्दशन करके अन्ना के सर्मथन मे उतरना मुनासिब समझा। इस प्रर्दशन मे मुख्य रूप से शामिल रही चंबल घाटी के आत्मसमर्पित दस्यु सुदंरी सीमा परिहार। जिसने मरते दम तक अन्ना हजारे का साथ देने का वादा किया। कभी चंबल घाटी मे आंतक का पर्याय रही सीमा परिहार के नये रूप से हर कोई भौचक है खास कर सीमा परिहार का यह कहना कि अन्ना का साथ मरते दम तक देना है।
सीमा परिहार का बदला हुआ रूप देख करके हर कोई इस रूप की चर्चा करने मे लग गया है।
चंबल की खूंखार वादियो मे अपने आंतक का डंका मचाने के बाद अपनी हकीकत की कहानी मे खुद को उतारने वाली सीमा परिहार अब टेलीविजन पर नजर आ चुकी  है यह पहला मौका रहा जब बिग बॉस जैसे कार्यक्रम के जरिये किसी खूखांर महिला अपराधी को छोटे पर्दे पर दर्शको को देखने का मौका मिला है।
वुंडेड नामक फिल्म के जरिये सीमा परिहार की कहानी देशवासी पहले ही देख चुके है जिसमे खुद सीमा परिहार ने किरदार अदा किया है। चंबल के नामचीन डकैतों के साथ दहशत की पर्याय बनी पूर्व दस्यु सुंदरी सीमा परिहार एक नए रूप में कलर्स पर प्रसारित हो चुके बिग बॉस के घर की सदस्य बनकर अपने जीवन चक्र से दर्शक रूबरू करा चुकी है। सीमा परिहार वह पहली दस्यु सुंदरी के रूप में सामने आई थी जिसने अपने डकैती के जीवन काल में ही माँ का तो दर्जा हासिल कर लिया, परंतु पत्नी वह आज तक किसी की नहीं बन सकी। हालांकि कुख्यात दस्यु सरगना निर्भय सिंह गूर्जर के साथ बेशक कुठारा (अजीतमल) में सात फेरे लिए हों और दस्यु सरगना रामआसरे तिवारी उर्फ फक्कड़ ने कन्यादान भी किया हो, परंतु निर्भय की मौत के बाद उसे न तो पति के अंतिम संस्कार की पुलिस प्रशासन ने ही और न ही समाज ने मान्यता दी।
बीहड़ में रहने के बावजूद हथियारों से दूर रहने वाली सीमा परिहार को विभिन्न दल जिस्म के लिए अपनाते रहे और सीमा सिर्फ गैंगवार से ही जूझती रही। अब जब पिछले एक दशक से सीमा ने बीहड़ को त्याग दिया तो अब वॉलीवुड की रंगीनियां उसे अपनी ओर आकर्षित कर रहीं हैं। वुंडेड फिल्म से अपनी नई जिंदगी की इबारत लिखने वाली सीमा परिहार बिग बॉस में अपनी एंट्री कर चुकी है। बिग बास के जरिये देश के सामने सेलिब्रिटी बन कर सामने आयी सीमा परिहार की दास्तां कम दर्दनाक नहीं है। इटावा जिले के बिठौली थाना क्षेत्र के कालेश्वर की गढ़िया (अनेठा) में खासा दबदबा रखने वाले बलबल सिंह परिहार के पुत्र शिरोमणि सिंह की सबसे छोटी बेटी की जिंदगी इस कदर बदनुमा हो जाएगी, यह किसी को नहीं पता था। सीमा की तीनों बड़ी बहिन की शादी हो गई थी। इसके बाद शिरोमणि सिंह औरैया जनपद के अयाना थाना क्षेत्र के ग्राम बबाइन में जा बसे। इसी बीच अपनी बड़ी बहिन मंजू के घर चकरनगर क्षेत्र में गई सीमा की आंख सिपाही भारत सिंह से क्या लड़ी कि उसकी जिंदगी की तस्वीर ही बदल गई। बकौल सीमा परिहार महज तेरह साल की उम्र में रंजिश के चलते कुख्यात दस्यु सरगना लालाराम ने उसे अगवा कर लिया और अठारह वर्ष उसने लालाराम के साथ बिताए।
इस बीच वह सामाजिक जीवन में वापस न जा सके इसके लिए उसके ऊपर पुलिस ने दर्जनों मुकदमे दर्ज कर लिए। सीमा परिहार को पाने के लिए लालाराम गिरोह के ही जय सिंह ने बगावत कर ली, परंतु पुलिस ने जब जय सिंह का जीना मुश्किल कर दिया तो फक्कड़ की शर्त पर जय सिंह ने निर्भय गूर्जर को सौंपा। इसके बाद 5 फरवरी, 1989 को फक्कड़ ने कन्यादान देकर निर्भय के साथ उसके सात फेरे करा दिए। जिंदगी का सुकून यहां भी खत्म नहीं हुआ। बीहड़ों में ही उसने मातृत्व सुख हासिल किया और निर्भय और लालाराम के बीच भंवर में वह फंस कर रह गई। दोनों में गैंगवार हो गया और अंततरू वर्ष 2000 में कानपुर देहात जनपद में लालाराम पुलिस की गोलियों का शिकार हो गया। इसी के साथ सीमा ने भी बीहड़ी जीवन को त्याग आत्मसमर्पण कर दिया। 7 नवंबर, 2005 को निर्भय की मौत के बाद जब सीमा परिहार ने अपने पति का पुलिस प्रशासन से शव मांगा तो उसके अनुरोध को पुलिस ने सिरे से खारिज कर दिया, बावजूद इसके सीमा ने वाराणसी में निर्भय की अस्थि विसर्जित कर जबरन पत्नी का दर्जा हासिल करने की कोशिश की। सीमा परिहार महिला डकैतों में ऐसी पहली महिला है जिसने बीहड़ी जीवन में मां बनने का सुख हासिल किया। हालांकि सीमा के बाद चंदन की पत्नी रेनू यादव, सलीम गूर्जर की प्रेयसी सुरेखा उर्फ सुलेखा और जगन गूर्जर की पत्नी कोमेश गूर्जर भी मां के सुख को हासिल कर चुकी थीं। अब देखना होगा कि बिग बॉस के घर में क्या सीमा अपने अतीत को साथियों के साथ शेयर करेंगी।
चंबल घाटी के इतिहास को यदि देखा जाएं तो अस्सी के दशक के बाद से सक्रिय हुईं दस्यु सुंदरियां सिर्फ दस्यु सरगनाओं के मनोरंजन भर का साधन रहीं थीं। पुतलीबाई और फूलन देवी ने तो अपने ऊपर हुए अत्याचारों के प्रतिशोध की भावना में हथियार थाम कर अपने आतंक का साम्राज्य स्थापित किया परंतु अस्सी के दशक के बाद जितनी भी दस्यु सुंदरियां उभर कर सामने आईं, इनमें से अधिकाधिक अगवा कर लाईं गईं थी। बाद में दस्यु सरगनाओं को दिल दे कर गिरोह पर साम्राज्य स्थापित किया। कुछ ऐसी ही बिडंवना रही सीमा परिहार के साथ। अब सीमा परिहार बेशक फूलन के नक्शे कदम पर चल कर संसद का रास्ता अख्तियार करने की मंशा रखती हो परंतु फूलन का दर्द जगजाहिर हो चुका था और यही कारण था कि जब फूलन ने मिर्जापुर के भदोई लोकसभा चुनाव लड़ा तो मतदाताओं ने फूलन को हाथों हाथ लिया। ऐसा सीमा परिहार के साथ हो सकेगा, इसके बारे में फिलहाल तो कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती है।
सीमा परिहार घाटी में महज दस्यु सरगनाओं के मोहरे तक ही सीमित रही। पहले सिपाही के साथ प्रेमपॉश में बंधने के साथ ही उसके जीवन का दुखद सिलसिला शुरु हो गया जिससे उसे अभी तक निजात नहीं मिल सकी है क्योंकि अभी भी वह दस्यु जीवन के मुकदमों से जूझ रही है। सीमा से जहां अपने जमाने के कुख्यात दस्यु सरगना लालाराम गिरोह ने जबरन जिस्मानी संबंध स्थापित किए वहीं दस्यु सरगना निर्भय गूर्जर को वह भेंट स्वरूप सौंपी गई थी। अपने जीवन में वह रखैल तो तमाम डकैतों की रही परंतु कन्यादान दस्यु सरगना रामआसरे तिवारी उर्फ फक्कड़ ने ही तब किया था जब निर्भय गूर्जर के साथ उसकी बीहड़ांचल के ही एक मंदिर में शादी कराई गई। अस्सी के दशक में सीमा परिहार के बाद लवली पांडे, अनीता दीक्षित, नीलम गुप्ता, सरला जाटव, सुरेखा, बसंती पांडे, आरती, सलमा, सपना सोनी, रेनू यादव, शीला इंदौरी, सीमा यादव, अनीता, सुनीता पांडे, गंगाश्री आदि ने भी बीहड़ में दस्तक दी परंतु इनमें से कोई सीमा परिहार जैसा नाम नहीं हासिल कर सकीं तथा सरला जाटव, नीलम गुप्ता और रेनू यादव के अतिरिक्त अन्य महिला डकैत पुलिस की गोलियों का शिकार हो गईं। हालांकि सीमा परिहार से लवली पांडे ज्यादा खतरनाक साबित हुई थी।
यौवनावस्था को बीहड़ में गुजार चुकी सीमा परिहार ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण पलों को चंबल की ऐसी घाटी में बिताया है जिसके बारे में सुनकर ही सिहरन हो उठती है। दस्यु जीवन में आमजनों के लिए खौफ का पर्याय बन चुकी सीमा परिहार के सीने में उठने वाला दर्द आज भी सीमा के चेहरे पर देखा जा सकता है। अपने इसी दर्द का उजागर करते हुए सीमा परिहार ने सपा में शामिल होने के बाद कई बिंदुओं पर खुलकर चर्चा की। समाजवादी पार्टी में शामिल हो चुकी सीमा परिहार ने राजनीतिक सफर तय करने के लिए चुनी सपा के बारे में कहा कि समाजवादी पार्टी ने हमेशा ही शोषितों के दर्द को समझा है। वह बतातीं हैं कि उसने दस्यु सुंदरी बनने का कोई सपना नहीं देखा था। उसे वक्त ने समय-समय पर छला और सपने पूरे होते इससे पहले ही उसके सपनों को तार-तार कर दिया जाता था। सपा नेत्री बन चुकी पूर्व दस्यु सुंदरी सीमा परिहार बतातीं हैं कि उन्होंने दस्यु जीवन को अलविदा कहने के बाद अपने ऊपर हुए अत्याचारों की लड़ाई लड़ने के लिए पहले इंडियन जस्टिस पार्टी को चुना मगर उसमें जस्टिस नाम की कोई चीज ही नहीं थी।
उसकी आवाज उसे इंसाफ दिला पाने में नाकामयाब साबित होती थी। वह बतातीं हैं दस्यु जीवन में जो दर्द उसने महसूस किया, वह चाहती हैं कि किसी अन्य महिला के जीवन में ऐसा मंजर न आए जो वह बंदूक थामे। अपनी इसी मंशा के तहत उसने राजनीति करने का निर्णय लिया और वह सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह का आभार जताया कि उन्होंने मुझे ऐसा मंच दिया है जिसके माध्यम से वह जनता के दर्द को महसूस करेंगीं और उनकी समस्याओं का समाधान कराने में वह अपनी भूमिका का निर्वाहन करेंगीं। दस्यु जीवन के बारे में वह कहतीं हैं कि घाटी के उन खौफनाक पलों को वह भूलना चाहतीं हैं। सीमा परिहार आज जब अन्ना के सर्मथन मे सडको पर उतरी उस समय उसके साथ करीब एक सैकडा से अधिक लोग उसके साथ थे लाल टीशर्ट और काली जींस के साथ अपनी क्रूर आंखो को छुपाने के लिये सीमा ने काला रंग के चश्मे को पहन रखा था नये रूप की सीमा को देखने के लिये बाद मे खासी तादात मे जुट गये कोई यह नही समझ पाये कि कभी हाथो मे बंदूक थाम कर अपराध करने वाली सीमा आखिरकार कैसे भ्रष्टाचार की मुहिम मे अन्ना के साथ आ खडी हुई है ?

सोमवार, 15 अगस्त 2011

अफसरो ने इटावा में तिरंगे को फहराया उल्टा, बंदर ने फाड कर अफसरो को सिखाया सबक

दिनेश शाक्य
राष्ट्रीय पर्वो पर अब राष्ट्रीय ध्वज का फहराया जाना सिर्फ औचारिकता भर रह गया है देश की शान तिरंगा झंडा सीधा फहराया जा रहा है या फिर उल्टा इससे किसी भी सरकारी अफसर को कोई मतलब नही रह गया है तभी तो उत्तर प्रदेश के इटावा मुख्यालय पर मेडिकल केयर यूनिट भवन पर तिरंगे को उल्टे फहरा कर इतिश्री कर ली गई पढे लिखे इंसानो की ओर से की गई तिरंगे के अपमान को लेकर की चूक पर बंदर ने अपना गुस्सा जता कर तिरंगे  को फाड डाला।
हर सरकारी कार्यलय पर तिरंगो को फहराये जाने के क्रम मे इटावा मुख्यालय पर स्थित स्वास्थ्य विभाग की मेडिकल केयर यूनिट भवन पर आज सुबह करीब 8 बजे तिरंगे  को फहराया गया और तिरंगो को फहराये जाने के बाद सभी अधिकारी और कर्मी मजे से चले गये लेकिन तिरंगे का कोई भी रखवाला केयर यूनिट मे नही रह गया।
इसके बाद जो हुआ उसे कैमरे मे वखूबी कैद किया । एक बंदर केयर यूनिट भवन पर चढ कर उल्टे फहराये गये तिरंगे को पहले तो हाथ से पकड करके देखता है उसके बाद उसे तार तार करके चलता बनता है।
राष्ट्रीय ध्वज को उल्टा फहरा कर सरकारी अफसरो ने जो अपमान किया वो एक बंदर को भी रास नही आया इसलिये उसने इंसानो को सबक सिखाने के लिये ध्वज को ही फाडना मुनासिब समझा है।
सरकारी व्यवस्था के अनुसार सुबह झंडारोहण के बाद देर शाम तक ध्वज की रखवाली करने की भी जिम्मेदारी विभागीय कर्मियो की ही रहती है लेकिन ध्वज सुरिक्षत कैसे रह सकता है जब कोई सरकारी कर्मी मौके पर रहेगा तब ना।
देश के राष्ट्रीय घ्वज के अपमान को लेकर इलाकाई लोग खासे नाखुश नजर आ रहे है उन्होने इस अपमान को लेकर सरकारी कर्मियो और अफसरो के खिलाफ कार्यवाही की मांग की है।
इटावा मे उल्टा राष्टीय ध्वज फहराये जाने को लेकर बहुतेरे लोग मेडिकल केयर यूनिट के सामने हालात देखने के लिये आ गये। इटावा व्यापार मंडल ईकाई के अध्यक्ष अंनत प्रताप अग्रवाल का कहना है कि यह देश के साथ खुला मजाक है सरकारी अफसरो ने स्वतंत्रता दिवस जैसे देशप्रेम भरे पर्व को सिर्फ औचारिकता भर समझ करके देश प्रेम की सही भावनाओ को निर्भाह नही किया है ऐसे अफसरो के खिलाफ ना केवल कार्यवाही अमल मे पाई जाये बल्कि ऐसी कार्यवाही की जाये ताकि भविष्य मे कोई दूसरा अफसर देश के सम्मान के साथ खिलवाड ना कर सके। वही दूसरी ओर अखिल भारतीय काग्रेस कमेटी के सदस्य श्रीमती सलमा बेगम का कहना है कि राष्ट्रीय का ऐसा अपमान इससे पहले ना तो देखा गया और ना ही सुना गया है। हकीकत मे मौके पर देखने पर ऐसा लग रहा है कि मेडिकल केयर यूनिट के अफसरो ने पहले तो देश के तिरंगो को उल्टा फहरा कर उसका अपमान किया फिर इन अफसरो पर गुस्सा खाकर एक बंदर ने अफसरो को सबक सिखाने की गरज से ध्वज को ही फाड डाला।
अब सवाल यह खडा होता है कि यह कैसे पढे लिखे अफसर रहे जो देश के तिरंगे मे अंतर नही पा सके कि वो सीधा है फिर उल्टा।